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डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’

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डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’
डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’
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डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’

हास्य-व्यंग्य, साहित्य और गीत-सृजन के माध्यम से अयोध्या की सांस्कृतिक चेतना को स्वर देने वाले साहित्यकार

पूरा नाम: डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’
स्थान: अयोध्या, उत्तर प्रदेश, भारत
पहचान: साहित्यकार, हास्य एवं व्यंग्य कवि, गीतकार, स्तंभकार
लोकप्रिय साहित्यिक पहचान: ‘ठहाका मैन’
प्रमुख रचना: “मैं हूँ अयोध्या की, अयोध्या प्रभु राम की”
विशेष रुचि एवं लेखन क्षेत्र: हास्य-व्यंग्य, सामाजिक सरोकार, पर्यावरण चेतना, अध्यात्म, अयोध्या की संस्कृति एवं जनजीवन


परिचय

भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा में हास्य और व्यंग्य केवल मनोरंजन के माध्यम नहीं रहे, बल्कि समाज को उसकी वास्तविकताओं से परिचित कराने की प्रभावशाली विधाएँ भी रहे हैं। इसी परंपरा को अपनी विशिष्ट अभिव्यक्ति, सहज भाषा और जन-सरोकारों से आगे बढ़ाने वाले रचनाकारों में डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ का नाम उल्लेखनीय है।

अयोध्या से जुड़े डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ एक ऐसे साहित्यिक व्यक्तित्व हैं जिनकी रचनात्मक दुनिया में हास्य की ऊर्जा, व्यंग्य की धार, सामाजिक चेतना, अध्यात्म, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और श्रीराम की नगरी अयोध्या के प्रति गहरा अनुराग एक साथ दिखाई देता है।

उनके व्यक्तित्व की सबसे अलग विशेषता यह है कि वे गंभीर विषयों को भी सहज, रोचक और स्मरणीय अभिव्यक्ति देने का प्रयास करते हैं। हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में उनकी सक्रिय पहचान ने उन्हें ‘ठहाका मैन’ जैसे लोकप्रिय संबोधन से भी जोड़ा है।


साहित्य के प्रति समर्पित जीवन

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ का साहित्यिक व्यक्तित्व केवल कविता लिखने तक सीमित नहीं है। उनकी रचनाओं में समाज, संस्कृति और मानवीय व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन दिखाई देता है।

हास्य-व्यंग्य के माध्यम से वे जीवन की विसंगतियों को सामने रखते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल किसी स्थिति पर हँसना नहीं, बल्कि हँसी के भीतर छिपे संदेश को पाठक तक पहुँचाना भी है।

उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति में एक ओर मनोरंजन है तो दूसरी ओर विचार; एक ओर ठहाका है तो दूसरी ओर आत्ममंथन।

यही कारण है कि उनकी रचनात्मक पहचान को इस भाव से समझा जा सकता है—

“हँसी ऐसी, जो चेहरे पर मुस्कान भी लाए और मन में एक सवाल भी छोड़ जाए।”


‘ठहाका मैन’ — हास्य और व्यंग्य की विशिष्ट पहचान

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की सार्वजनिक और साहित्यिक छवि विशेष रूप से हास्य एवं व्यंग्य से जुड़ी हुई है। विभिन्न प्रस्तुतियों में उन्हें ‘ठहाका मैन’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

उनसे जुड़ी एक प्रस्तुति में उन्हें—

“हँसी के परमाणु बम — ठहाका मैन”

जैसी प्रभावशाली उपमा के साथ प्रस्तुत किया गया।

यह संबोधन उनके हास्य की तीव्रता और प्रस्तुति की जीवंतता की ओर संकेत करता है। उनकी रचनाओं में हास्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक संवाद का माध्यम बनकर सामने आता है।

उनका लेखन पाठक को पहले आकर्षित करता है, फिर मुस्कुराता है और अंततः किसी सामाजिक या मानवीय प्रश्न पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।


अयोध्या के प्रति गहरा रचनात्मक लगाव

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की साहित्यिक यात्रा में अयोध्या केवल उनका स्थान नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक प्रेरणा का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी दिखाई देती है।

भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या की आध्यात्मिकता, सांस्कृतिक विरासत और गौरव को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से उन्होंने एक विशेष भक्ति गीत की रचना की—

“मैं हूँ अयोध्या की, अयोध्या प्रभु राम की…”

यह गीत अयोध्या और प्रभु श्रीराम के प्रति आस्था तथा सांस्कृतिक गौरव की भावना को अभिव्यक्त करता है।

उपलब्ध प्रकाशित सामग्री के अनुसार, इस गीत को गायिका प्रियंका ने अपनी आवाज दी, जबकि इसका संगीत रवि कपूर द्वारा तैयार किया गया।

गीत की रिकॉर्डिंग लखनऊ स्थित Apex Prime Studio में किए जाने का उल्लेख भी प्रकाशित सामग्री में मिलता है।


नगर निगम अयोध्या के सार्वजनिक प्रसारण से जुड़ा गीत

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ द्वारा रचित इस भक्ति गीत को एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक पहचान भी प्राप्त हुई।

उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, नगर निगम अयोध्या द्वारा गीत के सार्वजनिक प्रसारण की व्यवस्था की गई तथा इसे अयोध्या के सार्वजनिक प्रसारण तंत्र के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने की पहल की गई।

समाचार सामग्री में यह भी उल्लेख है कि गीत के प्रसारण का उद्देश्य अयोध्या की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अधिक प्रभावी ढंग से जन-जन तक पहुँचाना था।

गीत को सुबह और शाम सार्वजनिक प्रसारण के माध्यम से सुनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

यह उपलब्धि उनकी रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय है, क्योंकि किसी साहित्यकार द्वारा लिखे गए गीत का नगर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़कर सार्वजनिक स्तर पर प्रसारित होना उसकी रचना को व्यक्तिगत सृजन से आगे सामूहिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का स्वरूप देता है।


गीतकार के रूप में पहचान

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ केवल हास्य-व्यंग्य के लेखक नहीं बल्कि गीत-सृजन में भी सक्रिय रहे हैं।

उनका लेखन यह दर्शाता है कि वे विषय के अनुसार अपनी भाषा और भाव-भूमि को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं।

जहाँ हास्य-व्यंग्य में उनकी भाषा चुटीली और प्रहारात्मक दिखाई देती है, वहीं धार्मिक एवं सांस्कृतिक गीतों में उनका लेखन आस्था, श्रद्धा और भावनात्मकता से भर जाता है।

“अयोध्या प्रभु राम की” जैसे गीत के माध्यम से उन्होंने अयोध्या को केवल एक भौगोलिक नगर के रूप में नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।


दूरदर्शन के ‘घर-परिवार’ कार्यक्रम में विशेष अतिथि

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की साहित्यिक गतिविधियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी स्थान मिला है।

उपलब्ध कार्यक्रम सामग्री के अनुसार उन्हें दूरदर्शन लखनऊ के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘घर-परिवार’ में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।

कार्यक्रम में उनके साहित्यिक जीवन, हास्य-व्यंग्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति को लेकर बातचीत की गई।

उपलब्ध पोस्टर के अनुसार यह कार्यक्रम 25 अप्रैल 2026 को दोपहर 1:05 बजे प्रसारित किया गया तथा कार्यक्रम का संचालन रेखा बंसल द्वारा किया गया।

राष्ट्रीय सार्वजनिक प्रसारण मंच से साहित्य और हास्य-व्यंग्य पर संवाद उनके रचनात्मक सफर की उल्लेखनीय मीडिया उपस्थिति को दर्शाता है।


मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उपस्थिति

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनात्मक पहचान समाचार-पत्रों, डिजिटल प्लेटफॉर्म, संगीत माध्यमों और साक्षात्कार आधारित कार्यक्रमों में दिखाई देती है।

उनकी गतिविधियों से संबंधित प्रकाशित सामग्रियों में प्रमुख रूप से—

  • अयोध्या आधारित भक्ति गीत से संबंधित समाचार कवरेज,

  • हास्य-व्यंग्य कवि के रूप में प्रस्तुतियाँ,

  • दूरदर्शन लखनऊ में साक्षात्कार,

  • डिजिटल कार्यक्रमों में विशेष प्रस्तुति,

  • साहित्यिक पोस्टर एवं प्रकाशन,

  • गीत एवं संगीत प्लेटफॉर्म पर उनकी रचनाओं की प्रस्तुति

जैसी गतिविधियाँ दिखाई देती हैं।

इस प्रकार उनकी पहचान प्रिंट, टेलीविजन, डिजिटल मीडिया और संगीत—चारों माध्यमों तक विस्तारित दिखाई देती है।


‘खुरपेंची’ — सामाजिक प्रश्नों पर व्यंग्यात्मक दृष्टि

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनात्मकता का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी ‘खुरपेंची’ शैली/कॉलम में भी दिखाई देता है।

इसमें वे छोटी-छोटी पंक्तियों और सहज भाषा के माध्यम से बड़े सामाजिक प्रश्न उठाते हैं।

उनकी एक रचना पर्यावरण संरक्षण और पेड़ों के महत्व पर केंद्रित है—

“लाख मिले शुभकामना,
हो जाओ दीर्घायु।
आयु भला कैसे बढ़े,
शुद्ध नहीं जलवायु॥”

इसके बाद वे मनुष्य और प्रकृति के संबंध पर व्यंग्य करते हुए पेड़ों की रक्षा का संदेश देते हैं।

इन पंक्तियों में हास्य और तुकबंदी के भीतर एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी छिपी हुई है।

यही उनकी लेखन शैली की विशेषता है—कम शब्दों में व्यापक संदेश।


हास्य के भीतर सामाजिक चेतना

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ का हास्य जीवन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

उनका व्यंग्य उन छोटी-बड़ी परिस्थितियों को विषय बनाता है जिन्हें आम व्यक्ति प्रतिदिन देखता तो है, लेकिन उन पर गंभीरता से विचार नहीं करता।

उनकी रचनाएँ पाठक को यह अनुभव कराती हैं कि हास्य का सर्वोत्तम रूप वह है जिसमें व्यक्ति दूसरे पर हँसने के बजाय समाज और स्वयं को पहचान सके।

यही कारण है कि उनका लेखन मनोरंजन और सामाजिक टिप्पणी के बीच एक सेतु का कार्य करता है।


प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनाओं में पर्यावरण संरक्षण की चिंता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

पेड़ों को काटने, प्रदूषण और बिगड़ती जलवायु जैसे विषयों को उन्होंने साहित्यिक और व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है।

उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों का भाव यह संदेश देता है कि मनुष्य जिस प्रकृति की पूजा करता है, उसी प्रकृति को नष्ट करके स्वस्थ जीवन की अपेक्षा नहीं कर सकता।

इस प्रकार उनका साहित्य केवल हास्य प्रदान नहीं करता, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करता है।


अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान के साहित्यिक प्रतिनिधि

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनाओं में अयोध्या बार-बार दिखाई देती है।

उनके लिए अयोध्या—

आस्था भी है,
संस्कृति भी है,
साहित्य भी है
और रचनात्मक प्रेरणा भी।

श्रीराम के प्रति श्रद्धा से लिखे गए गीत से लेकर सामाजिक विषयों पर लिखे गए व्यंग्य तक, उनकी रचनात्मक यात्रा में स्थानीय संस्कृति और व्यापक मानवीय सरोकारों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।


लेखन शैली

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की लेखन शैली की प्रमुख विशेषताओं में सहजता और संप्रेषणीयता प्रमुख हैं।

वे अत्यधिक जटिल भाषा के बजाय ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिसे सामान्य पाठक आसानी से समझ सके।

उनकी शैली में—

हास्य में चुटीलापन,
व्यंग्य में सामाजिक टिप्पणी,
कविता में लय,
गीतों में भावनात्मकता,
और सांस्कृतिक रचनाओं में श्रद्धा

का समावेश दिखाई देता है।

इसी बहुआयामी अभिव्यक्ति ने उन्हें हास्य-व्यंग्य तक सीमित रहने के बजाय एक व्यापक साहित्यिक व्यक्तित्व प्रदान किया है।


‘Best Writer of the Year’ से जुड़ी सार्वजनिक प्रस्तुति

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ से संबंधित उपलब्ध प्रचार सामग्री में उन्हें “Best Writer of the Year” के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।

साथ ही एक साहित्यिक प्रस्तुति में उनके लिए—

“हिन्दी साहित्य को समर्पित साहित्यकार”

शब्दों का प्रयोग किया गया है।

यह उनकी उस साहित्यिक छवि को रेखांकित करता है जिसमें हिंदी भाषा, साहित्य और रचनात्मक लेखन उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व के केंद्र में दिखाई देते हैं।


रचनाकार से अधिक—एक सांस्कृतिक संवादकर्ता

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की यात्रा को केवल लेखक या कवि की सीमित परिभाषा में रखना पर्याप्त नहीं होगा।

वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज से संवाद स्थापित करते हैं।

कभी यह संवाद ठहाके के माध्यम से होता है, कभी कविता के माध्यम से, कभी पर्यावरणीय संदेश के माध्यम से और कभी प्रभु श्रीराम तथा अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत को समर्पित गीत के माध्यम से।

यही विविधता उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाती है।


साहित्यिक दर्शन

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की उपलब्ध रचनाओं को देखकर उनके साहित्यिक दृष्टिकोण का सार तीन शब्दों में समझा जा सकता है—

हँसाना • जगाना • जोड़ना

हँसाना, क्योंकि हास्य उनके साहित्य की प्रमुख पहचान है।
जगाना, क्योंकि उनके व्यंग्य सामाजिक चेतना उत्पन्न करते हैं।
जोड़ना, क्योंकि उनकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रचनाएँ व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।


एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान

आज के समय में जब साहित्य डिजिटल मंचों, सोशल मीडिया, संगीत और वीडियो के माध्यम से नई पीढ़ियों तक पहुँच रहा है, डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनात्मक गतिविधियाँ भी साहित्य के इसी विस्तृत स्वरूप का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

उनके व्यक्तित्व में एक ओर पारंपरिक हिंदी साहित्य की आत्मा दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक मीडिया माध्यमों से संवाद स्थापित करने की क्षमता भी दिखाई देती है।

हास्य-व्यंग्य कवि ‘ठहाका मैन’, गीतकार, साहित्यकार और अयोध्या की सांस्कृतिक चेतना से जुड़े रचनाकार के रूप में डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की साहित्यिक यात्रा शब्दों को जन-संवाद में बदलने की यात्रा है।


एक पंक्ति में डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’

“अयोध्या की सांस्कृतिक चेतना, समाज की विसंगतियों और जीवन की सहज मुस्कान को अपने शब्दों में समेटने वाले हास्य-व्यंग्य साहित्यकार और गीतकार।”


हाँ, biography को और premium बनाने के लिए ये sections add कर दो:

साहित्यिक व्यक्तित्व और जन-संवाद

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की रचनात्मकता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनका साहित्य आम जनजीवन से सीधा संवाद करता है। उनकी भाषा सहज, जीवंत और प्रभावपूर्ण है। वे ऐसी रचनाएँ लिखते हैं जिन्हें पढ़ने वाला व्यक्ति केवल मनोरंजन ही नहीं पाता, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों, मानवीय व्यवहार और बदलते परिवेश पर सोचने के लिए भी प्रेरित होता है।

हास्य को सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया

उनकी रचनाओं में हास्य किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित न होकर सामाजिक प्रवृत्तियों और जीवन की विडंबनाओं को सामने लाने का माध्यम बनता है। इसी कारण उनका हास्य केवल ‘हँसाने’ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें एक विचार और संदेश भी छिपा होता है।

आस्था और आधुनिक साहित्य का सुंदर संगम

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की साहित्यिक पहचान की एक विशेषता यह भी है कि वे आधुनिक सामाजिक विषयों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को भी अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। अयोध्या और भगवान श्रीराम से जुड़े उनके गीत उनकी आस्था तथा सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाते हैं।

अयोध्या को शब्दों में जीवंत करने वाला रचनाकार

उनकी रचनाओं में अयोध्या केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भावना, संस्कृति और आध्यात्मिकता के रूप में दिखाई देती है। उन्होंने अयोध्या की पहचान, प्रभु श्रीराम के प्रति श्रद्धा और स्थानीय सांस्कृतिक गौरव को गीत और साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।

बहुआयामी रचनात्मक व्यक्तित्व

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ का साहित्यिक व्यक्तित्व कई विधाओं को समेटे हुए है। वे हास्य-व्यंग्य, कविता, गीत, सामाजिक टिप्पणी और सांस्कृतिक लेखन जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय दिखाई देते हैं। यही बहुआयामी प्रतिभा उन्हें एक विशिष्ट रचनाकार के रूप में स्थापित करती है।

सरल शब्द, गहरा प्रभाव

उनकी लेखन शैली में कठिन शब्दावली के बजाय सरल और बोलचाल की भाषा का प्रयोग अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि उनका लेखन विद्वत वर्ग के साथ-साथ सामान्य पाठक तक भी आसानी से पहुँचता है।

पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी

उनकी रचनाओं में पेड़-पौधों, पर्यावरण और मानव जीवन के बीच संबंध पर भी गंभीर संदेश दिखाई देता है। हास्य और कविता के माध्यम से वे पर्यावरण संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण चिंताओं को सरल रूप में सामने रखते हैं।

मंचीय और मीडिया उपस्थिति

उनकी साहित्यिक पहचान केवल लिखित रचनाओं तक सीमित नहीं रही। दूरदर्शन, साक्षात्कार, डिजिटल कार्यक्रमों और प्रचार सामग्री में उनकी उपस्थिति उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के सार्वजनिक विस्तार को दर्शाती है। इससे वे लेखक के साथ-साथ एक प्रभावशाली साहित्यिक वक्ता और जन-संवादकर्ता के रूप में भी सामने आते हैं।

नई पीढ़ी तक साहित्य पहुँचाने का प्रयास

उनकी रचनाएँ पारंपरिक हिंदी साहित्य और आधुनिक डिजिटल माध्यमों के बीच एक सेतु का कार्य करती दिखाई देती हैं। गीत, वीडियो, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से साहित्य को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाना उनकी रचनात्मक यात्रा का महत्वपूर्ण पक्ष है।

रचनात्मकता का मूल उद्देश्य

उनकी उपलब्ध रचनाओं से यह भाव स्पष्ट होता है कि साहित्य उनके लिए केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम है। वे हास्य के माध्यम से तनाव कम करते हैं, व्यंग्य के माध्यम से प्रश्न उठाते हैं और सांस्कृतिक रचनाओं के माध्यम से समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।

Premium Legacy Paragraph

डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ की साहित्यिक यात्रा उस रचनाकार की यात्रा है जो शब्दों में केवल कविता नहीं रचता, बल्कि समाज की धड़कनों को सुनता है। उनके साहित्य में अयोध्या की आध्यात्मिकता, भारतीय संस्कृति की गरिमा, जीवन की सहज मुस्कान और समाज की वास्तविकताओं का अनूठा संगम दिखाई देता है। हास्य-व्यंग्य की प्रभावी शैली, सांस्कृतिक गीतों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और जन-सरोकारों के प्रति संवेदनशील दृष्टि उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

 Closing Line

“डॉ. ताराचंद्र ‘तन्हा’ ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कलम कभी ठहाका बनकर गूँजती है, कभी व्यंग्य बनकर सवाल उठाती है और कभी भक्ति बनकर अयोध्या एवं प्रभु श्रीराम की महिमा को स्वर देती है।”

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